प्रभव संवत्सर  

प्रभव हिन्दू धर्म में मान्य संवत्सरों में से एक है। यह 60 संवत्सरों में पहला है। प्रभव नामक संवत्सर आने पर विश्व में कहीं हानि कहीं वृद्धि, कहीं भय कहीं रोग और प्रजा में यज्ञ कर्म जैसे शुभ कार्यों कि भावना रहती है। इस संवत्सर के स्वामी भगवान विष्णु हैं।

  • प्रभव सवंत्सर में जन्म लेने वाला शिशु वस्तुओं का संग्रह करने वाला,दिर्घायु, श्रेष्ठ बुद्धि वाला, सुखी, कुल धर्म का पालन करने वाला होता है।
  • ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरम्भ चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से किया था, अतः नव संवत का प्रारम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है।
  • हिन्दू परंपरा में समस्त शुभ कार्यों के आरम्भ में संकल्प करते समय उस समय के संवत्सर का उच्चारण किया जाता है।
  • संवत्सर 60 हैं। जब 60 संवत पूरे हो जाते हैं तो फिर पहले से संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है।

विभव संवत्सर  

विभव हिन्दू धर्म में मान्य संवत्सरों में से एक है। यह 60 संवत्सरों में दूसरा है। इस संवत्सर के आने पर विश्व में किसानों के लिए अच्छी वर्षा तथा प्रजा में सुख समृद्धि रहती है। इस संवत्सर के स्वामी बृहस्पति हैं।

  • विभव संवत्सर में जन्म लेने वाला शिशु बलवान, कलाकुशल, चतुर, परोपकारी, चंचल तथा विद्वान होता है।
  • ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरम्भ चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से किया था, अतः नव संवत का प्रारम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है।
  • हिन्दू परंपरा में समस्त शुभ कार्यों के आरम्भ में संकल्प करते समय उस समय के संवत्सर का उच्चारण किया जाता है।
  • संवत्सर 60 हैं। जब 60 संवत पूरे हो जाते हैं तो फिर पहले से संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है।

शुक्ल संवत्सर  

शुक्ल हिन्दू धर्म में मान्य संवत्सरों में से एक है। यह 60 संवत्सरों में तीसरा है। इस संवत्सर के आने पर विश्व में धान्य प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होता है, प्रजा आनंद से रहती है और उसमें शत्रुता की भावना भी नहीं रहती। इस संवत्सर के स्वामी देवराज इन्द्र हैं।

  • शुक्ल संवत्सर में जन्म लेने वाला शिशु शुद्ध, शांतचित्त, सुशील, उदार, उत्तम भाग्य और सम्पूर्ण गुणों से युक्त होता है।
  • ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरम्भ चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से किया था, अतः नव संवत का प्रारम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है।
  • हिन्दू परंपरा में समस्त शुभ कार्यों के आरम्भ में संकल्प करते समय उस समय के संवत्सर का उच्चारण किया जाता है।
  • संवत्सर 60 हैं। जब 60 संवत पूरे हो जाते हैं तो फिर पहले से संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है।

प्रमोद संवत्सर  

प्रमोद हिन्दू धर्म में मान्य संवत्सरों में से एक है। यह 60 संवत्सरों में चौथा है। इस संवत्सर के आने पर विश्व में प्रजा में सुख वैभव कि वृद्धि होती है। इस संवत्सर के स्वामी लोहित हैं।

  • प्रमोद संवत्सर में जन्म लेने वाला शिशु दानी, संतान सुख से युक्त, गुणी, सत्यवादी, राजा से सम्मानित होता है।
  • ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरम्भ चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से किया था, अतः नव संवत का प्रारम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है।
  • हिन्दू परंपरा में समस्त शुभ कार्यों के आरम्भ में संकल्प करते समय उस समय के संवत्सर का उच्चारण किया जाता है।
  • संवत्सर 60 हैं। जब 60 संवत पूरे हो जाते हैं तो फिर पहले से संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है।

प्रजापति संवत्सर  

प्रजापति हिन्दू धर्म में मान्य संवत्सरों में से एक है। यह 60 संवत्सरों में पाँचवाँ है। इस संवत्सर के आने पर विश्व में रोग, व्याधि आदि नहीं रहती, स्वजनों में मैत्री भावना बनी रहती है और विश्व में चतुर्विध उन्नति होती है। इस संवत्सर के स्वामी त्वष्टा हैं।

  • प्रजापति संवत्सर में जन्म लेने वाला शिशु अभिमान से रहित, दयालु, विनीत तथा देवताओं की पूजा करने वाला होता है।
  • ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरम्भ चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से किया था, अतः नव संवत का प्रारम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है।
  • हिन्दू परंपरा में समस्त शुभ कार्यों के आरम्भ में संकल्प करते समय उस समय के संवत्सर का उच्चारण किया जाता है।
  • संवत्सर 60 हैं। जब 60 संवत पूरे हो जाते हैं तो फिर पहले से संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है।

अंगिरा संवत्सर  

अंगिरा हिन्दू धर्म में मान्य संवत्सरों में से एक है। यह 60 संवत्सरों में छठा है। इस संवत्सर के आने पर विश्व में भोग विलास की वृद्धि होती है। इस संवत्सर का स्वामी अहुर्बुधन्य को कहा गया है।

  • अंगिरा संवत्सर में जन्म लेने वाला शिशु कांतिमान, सुखी, भोगी, मानी, प्रियवक्ता, दीर्घजीवी, अपने विचार को गुप्त रखने वाला होता है।
  • ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरम्भ चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से किया था, अतः नव संवत का प्रारम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है।
  • हिन्दू परंपरा में समस्त शुभ कार्यों के आरम्भ में संकल्प करते समय उस समय के संवत्सर का उच्चारण किया जाता है।
  • संवत्सर 60 हैं। जब 60 संवत पूरे हो जाते हैं तो फिर पहले से संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है।

श्रीमुख संवत्सर  

श्रीमुख हिन्दू धर्म में मान्य संवत्सरों में से एक है। यह 60 संवत्सरों में सातवाँ है। इस संवत्सर के आने पर विश्व में दूध देने वाली गौओं की वृद्धि तथा वर्षा उत्तम होती है और जनसंख्या में अधिक वृद्धि होती है। इस संवत्सर के स्वामी पितर हैं।

  • श्रीमुख संवत्सर में जन्म लेने वाला शिशु श्रीमान, प्रतापी और बहुशास्त्र ज्ञाता होता है।
  • ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरम्भ चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से किया था, अतः नव संवत का प्रारम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है।
  • हिन्दू परंपरा में समस्त शुभ कार्यों के आरम्भ में संकल्प करते समय उस समय के संवत्सर का उच्चारण किया जाता है।
  • संवत्सर 60 हैं। जब 60 संवत पूरे हो जाते हैं तो फिर पहले से संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है।

भाव संवत्सर  

भाव हिन्दू धर्म में मान्य संवत्सरों में से एक है। यह 60 संवत्सरों में आठवाँ है। इस संवत्सर के आने पर विश्व में राजाओं के तेज की वृद्धि होती है, शत्रुओं को कष्ट उठाना पड़ता है और प्राणियों में सद्भावना बनी रहती है। इस संवत्सर के स्वामी विश्वेदेव हैं।

  • भाव संवत्सर में जन्म लेने वाला शिशु यशस्वी, गुणवान, विनीत, प्रसन्न, प्रशस्त और दानी होता है।
  • ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरम्भ चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से किया था, अतः नव संवत का प्रारम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है।
  • हिन्दू परंपरा में समस्त शुभ कार्यों के आरम्भ में संकल्प करते समय उस समय के संवत्सर का उच्चारण किया जाता है।
  • संवत्सर 60 हैं। जब 60 संवत पूरे हो जाते हैं तो फिर पहले से संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है।

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