विज्ञान की तीन शाखाएं--रसायन, जैव और भौतिक विज्ञान


विज्ञान की तीन शाखाएं--रसायन, जैव और भौतिक विज्ञान

विज्ञान की तीन शाखाएं होती हैं- 

👉रसायन, 

👉जैव और 

👉भौतिक विज्ञान। 

♨️भौतिक विज्ञान में पदार्थ, ब्रह्माण्ड और खगोल विज्ञान शामिल हैं। 

♨️जैव और भौतिक विज्ञान दोनों को मिला
कर एक और विज्ञान है जिसे प्रचलित भाषा में अध्यात्म कहा जाता है। 

👉अधिकतर लोगों तो यही सोचते और समझते हैं कि अध्यात्म और विज्ञान विरोधाभासी हैं और दोनों अलग अलग
धाराएं हैं। पर वास्तव में ये एक ही हैं।

♨️भौतिक विज्ञान कहता है कि यह सारा ब्रह्माण्ड किसी एक ही पदार्थ से बना है 

👉अध्यात्मके अनुसार इस पूरी सृष्टि को परमात्मा ने रचा है। 

♨️भौतिक विज्ञान कहता है कि कोई भी पदार्थ या अपदार्थ कभी नष्ट नहीं हो सकता बस उसका स्वरुप या स्थान परिवर्तित हो जाता है। जब कि 

👉अध्यात्म में इसे आत्मा कहा जाता है जो अजर, अमर और अविनाशी है जो कभी नहीं मरती। 

♨️वैज्ञानिक शोध कार्य और परीक्षण द्वारा खोज करते हैं 

👉जबकि योगी साधना और तपस्या से सिद्धि प्राप्त करते हैं। 

🔴दोनों एक ही कार्य करते हैं बस माध्यम और ढंग अलग होता है।"

"हम परा-विज्ञान की बात कर रहे थे। चलो एक बात बताओ ? कई बार तुमने देखा होगी
कि हम किसी व्यक्ति को जब पहली बार मिलते हैं तो वो पता नहीं हमें क्यों अच्छा लगता
है। हम उससे बात करना चाहते हैं, उसकी निकटता चाहते हैं और दूसरी ओर किसी व्यक्ति को
देख कर हमें क्षोभ और चिढ़ सी होती है जबकि उस बेचारे ने हमारा कुछ नहीं बिगाड़ा
होता। ऐसा क्यों होता है ? अच्छा एक बात और बताओ तुम मुझे नहीं जानते थे, ना कभी
पहले मिले थे फिर भी तुमने मुझे अभिवादन किया ? क्यों ?"

"वो... वो... मैं ... ?" मुझे तो कोई जवाब ही नहीं सूझा।

"मैं समझाता हूँ !" प्रोफ़ेसर ने गला खंखारते हुए कहा,"हमारे 🔴इस शरीर से कुछ अदृश्य किरणें निकलती रहती हैं जो हमारे शरीर के चारों ओर एक चक्र (औरा) बनाये रहती हैं। यदि
👉दोनों व्यक्तियों की ये अदृश्य किरणें धनात्मक हुई तो वो एक दूसरे को अच्छे लगेंगे अन्यथा नहीं। 

♨️जिसका यह चक्र जितना अधिक विस्तृत होगा उसका व्यक्तित्व उतना ही विशेष होगा और वह सभी को प्रभावित कर लेगा।"

♨️"भौतिक विज्ञान के अनुसार जब कोई पदार्थ नष्ट नहीं हो सकता तो फिर हमारी स्मृतियाँ और विचार कैसे नष्ट हो सकते हैं।

♨️ वास्तव में मृत्यु के बाद हमारे भौतिक शरीर के पञ्च तत्वों
में मिल जाने के बाद भी हमारी स्मृतियाँ और आत्मा किसी विद्युत और चुम्बकीय तरंगों या अणुओं के रूप में इसी अनंत ब्रह्माण्ड में विद्यमान रहती हैं। 

श्रीमद् भगवद् गीता के अनुसार
भी वही अपदार्थ, अणु या अदृश्य तरंगें (आत्मा) अपने अनुकूल और उपयुक्त शरीर ढूंढ कर नया
जन्म ले लेता है। हम सबका पता नहीं कितनी बार जन्म और मृत्यु हुई है।"

"हमारे इस भौतिक शरीर के इतर (परे) भी एक और शरीर और संसार होता है जिसे सूक्ष्म
शरीर और परलोक कहते हैं। पुनर्जन्म, परा विज्ञान और अपदार्थ (एंटी मैटर) की
अवधारणाएं भी इन्हीं सिद्धांतों पर आधारित हैं।"

"एक और बात बताता हूँ।" बढ़ऊ ने कहना जारी रखा।

"अपना पिछला जन्म और भविष्य जानने की सभी की उत्कट इच्छा रहती है। पुरातन काल से
ही इस विषय पर लोग शोध कार्य (तपस्या) करते रहे हैं। उनकी भविष्यवाणियाँ सत्य हुई
हैं। आपने भारतीय धर्मशास्त्रों में श्राप और वरदानों के बारे में अवश्य सुना होगा। वास्तव
में यह भविष्यवाणियाँ ही थी। उन लोगों ने अपनी तपस्या के बल पर यह सिद्धियाँ (खोज)
प्राप्त की थी। यह सब हमारी मानसिक स्थिति और उसकी किसी संकेत या तरंग को ग्रहण
करने की क्षमता पर निर्भर करता है। आध्यात्म में इसे ध्यान, योग या समाधी भी कहा
जाता है। इसके द्वारा कोई योगी (साधक) अपने सूक्ष्म शरीर को भूत या भविष्य के किसी
कालखंड या स्थान पर ले जा सकता है और उन घटनाओं और व्यक्तियों के बारे में जान सकता
है। आपने फ्रांस के नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियों के बारे में तो अवश्य सुना होगा। आज भी
ऐसा संभव हो सकता है।"

"क्या आप भी इनके बारे में जानते हैं ?" मैंने डरते डरते पूछा कहीं बढ़ऊ बुरा ना मान जाए।

प्रोफ़ेसर रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराया और फिर बोला "देखो तुम शायद सोच रहे होंगे कि यह
प्रोफ़ेसर भी भांग के नशे में गप्प मार रहा होगा पर इस सम्बन्ध में तो महान वैज्ञानिक
आइन्स्टीन ने (जिसका सापेक्षवाद का सिद्धांत विज्ञान की दुनिया में मील का पत्थर है)
अपने जीवन के अंतिम दिनों में (पिछली शताब्दी के 40 के दशक में) एक अविश्वसनीय और
चमत्कारी खोज की थी ‘यूनिफाइड फ़ील्ड थ्योरी’। यह किसी पदार्थ को अदृश्य (अपदार्थ
बना देना) कर देने का सूत्र था। उसे डर था कि कुछ लोग इसका गलत लाभ उठा सकते हैं
इसलिए उसने इस सूत्र को गुप्त रखा। पर सन 1943 में जब हिटलर विश्व विजय का सपना
देख रहा था तब यह सूत्र अमेरिकी सरकार को देना पड़ा। लगभग उन्हीं दिनों उसने समय की
गति को आगे पीछे करने का सूत्र भी खोज लिया था। यह इतनी रहस्यमयी खोज थी कि इसके
द्वारा भूत या भविष्य के किसी भी काल खंड में पहुंचा जा सकता था।

यह अवधारणा गप्प नहीं वैज्ञानिक तथ्य है। यह सूत्र (फ़ॉर्मूला) भी उसने बहुत गोपनीय
रखा था। अमेरिका के गृह मंत्रालय की फाइलों में आज भी उस खोज से सम्बंधित दस्तावेज पड़े
हैं। अमेरिका सरकार ने उसे गुप्त और सुरक्षित रखा है। तुमने टाइम मशीन के बारे में तो
अवश्य सुना और फिल्मों में देखा होगा। यह सब उसी सूत्र पर आधारित है।"

"गीता में बहुत से योगों के बारे में बताया गया है पर इन में कर्म, भक्ति और ज्ञान योग
को विशेष रूप से बताया गया है। ज्ञान योग में ही एक शाखा ध्यान, समाधि, सम्मोहन और
त्राटक की भी है। मैं तुम्हें एक अनुभूत प्रयोग करके दिखाता हूँ। तुम अपनी आँखें बंद करो और
मैं जो कहूं उसे ध्यान से सुनो और वैसा ही विचार करो।"

प्रोफ़ेसर के कहे अनुसार तो मैंने अपनी आँखें बंद कर ली तो वो बोला,"प्रेम ! तुम एक नदी के
किनारे खड़े हो। दूर पहाड़ों से आती इस नदी का जल देखो कितना निर्मल लग रहा है।
इसकी बल खाती लहरें देखो ऐसे लग रही हैं जैसे कोई नवयुवती अपनी कमर लचका कर चल रही
हो !"

मुझे लगा जैसे मैं सचमुच किसी नदी के किनारे ही खड़ा हूँ और मधु सफ़ेद पैंट पहने अपने नितम्बों
को मटकाती नदी के किनारे चल रही है। ओह... यह तो कमाल था।

"अब अपनी आँखें खोल लो !"

मैंने अपनी आँखें खोल ली तो प्रोफ़ेसर ने पूछा,"तुमने कुछ देखा ?"

"हाँ सचमुच मुझे ऐसा लगा जैसे मैं नदी के किनारे खड़ा हूँ और उसकी बल खाती लहरों और साफ़
पानी को देख रहा हूँ। उस में चलती नाव और मछलियाँ भी मैंने देखी !" मैंने मधु वाली बात
को जानबूझ कर गोल कर दिया।

"मेरे अनुमान है तुम इस सिद्धांत से सहमत हो गए हो ! वास्तव में हम जब अपनी सभी
इन्द्रियों को नियंत्रित करके ध्यान पूर्वक किसी व्यक्ति, स्थान, घटना या कालखंड के बारे
में सोचते हैं तो हमारे मस्तिष्क में वही सब अपने आप सजीव हो उठता है और हम वहीं पहुँच
कर उसे देखने लग जाते हैं। इसे दिवा स्वप्न भी कहते हैं। वास्तव में हम जो रात्रि में सपने
देखते हैं या जो तुमने आँखें बंद करके अभी देखा या अनुभव किया वह सब कहाँ से आया था और
अब कहाँ चला गया ? वास्तव में वह ‘अपदार्थ’ (एंटी मैटर) के रूप में कहीं ना कहीं पहले से
विद्यमान था, अब भी है और भविष्य में भी रहेगा। यही ‘परा-विज्ञान’ है।"

"ओह … अद्भुत !..." मैं तो अवाक सुनता ही रहा।

मैं अपने भविष्य के बारे में कुछ जानना चाहता था। मैंने पूछा "प्रोफ़ेसर साहब एक बात
बताइये- क्या आप हस्त रेखाओं के बारे में भी जानते हैं ?"

उसने मेरी ओर इस तरह देखा जैसे मैं कोई शुतुरमुर्ग या चिड़िया घर से छूटा जानवर हूँ। ओह …
मुझे अब अपनी गलती का अहसास हुआ था। मैं बेतुका और बेहूदा सवाल पूछ बैठा हूँ।

प्रोफ़ेसर मुस्कुराते हुए बोला,"हाँ मैं हस्त रेखा और शरीर विज्ञान के बारे में भी जानता हूँ।"

"ओह … मुझे क्षमा करें मैंने व्यर्थ का प्रश्न पूछ लिया !"

"नहीं प्रेम कोई भी प्रश्न व्यर्थ नहीं होता। यह सब अवचेतन मन के कारण होता है। तुम
संभवतः नहीं जानते हमें रात्रि में जो स्वप्न आते हैं वो सब हमारे अवचेतन मन में दबी-छिपी
इच्छाओं का ही रूपांतरण होता है। तुमने हस्त रेखाओं के बारे में पूछा है तो तुम्हारे में कहीं
ना कहीं कुछ पाने की अदम इच्छा बलवती हो रही है और तुम इन हस्त रेखाओं के माध्यम से
यह जानने का प्रयास कर रहे हो कि वो कभी फलीभूत होंगी या नहीं ?"

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